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Saturday, October 29, 2016

फिर अंधेरों से क्यों डरें!




प्रदीप है नित कर्म पथ पर
फिर अंधेरों से क्यों डरें!

हम हैं जिसने अंधेरे का
काफिला रोका सदा,
राह चलते आपदा का
जलजला रोका सदा,
जब जुगत करते रहे हम
दीप-बाती के लिए,
जलते रहे विपद क्षण में
संकट सब अनदेखा किए|

प्रदीप हम हैं जो
तम से सदा लड़ते रहे,
हम पुजारी, प्रिय हमें है
ज्योति की आराधना,
हम नहीं हारे भले हो
तिमिर कितना भी घना,
है प्रखर आलोक उज्ज्वल
स्याह रजनी के परे

श्रेष्ठ भारत लक्ष्य सदा है
फिर अंधेरों से क्यों डरें!

8 comments:

  1. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 01/11/2016 को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

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  2. हाँ ,अँधेरे से क्या डरना !

    ReplyDelete
  3. ये रोशनी जग मे' सदा अमर रहे, ,,,

    ReplyDelete
  4. ये रोशनी जग मे' सदा अमर रहे, ,,,

    ReplyDelete
  5. नाम वही, काम वही लेकिन हमारा पता बदल गया है। आदरणीय ब्लॉगर आपने अपने ब्लॉग पर iBlogger का सूची प्रदर्शक लगाया हुआ है कृपया उसे यहां दिए गये लिंक पर जाकर नया कोड लगा लें ताकि आप हमारे साथ जुड़ें रहे।
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